वंदे मातरम् की 150वीं जयंती: जानिए राष्ट्रगीत से जुड़े महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य
मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में वंदे मातरम् की 150वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्रगीत के ऐतिहासिक महत्व और स्वतंत्रता संग्राम में इसकी भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रप्रेम और मातृभूमि की स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रतीक माना गया।
राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1876 को बंगाल के कांतलपाड़ा में की थी। बाद में इसे उनकी प्रसिद्ध कृति ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। ‘आनंदमठ’ का पुस्तक रूप में प्रकाशन वर्ष 1882 में हुआ।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘वंदे मातरम्’ देशवासियों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ। इस गीत ने लोगों में राष्ट्रप्रेम और आजादी की भावना को मजबूत किया। महान शास्त्रीय संगीतकार पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने भी देशभर में इसकी ओजपूर्ण प्रस्तुतियों के माध्यम से इसे लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्ष 1896 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने पहली बार ‘वंदे मातरम्’ का सार्वजनिक राजनीतिक मंच पर गायन किया। उन्होंने इस गीत का संगीत भी तैयार किया था। इसके बाद स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विभिन्न कांग्रेस अधिवेशनों और आंदोलनों में इसका गायन होने लगा।
वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के बाद स्वदेशी आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष देशभर में गूंजने लगा। स्कूलों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर लोग इसे राष्ट्रप्रेम के प्रतीक के रूप में गाने लगे। अंग्रेजी शासन ने इसे रोकने के प्रयास भी किए, लेकिन आंदोलनकारियों के बीच इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती रही।
वर्ष 1915 से कांग्रेस अधिवेशनों की शुरुआत ‘वंदे मातरम्’ के गायन से करने की परंपरा बनी। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी इसे इंडियन नेशनल आर्मी से जोड़ा और सिंगापुर रेडियो स्टेशन से इसका प्रसारण किया जाता था।
‘वंदे मातरम्’ को लेकर वर्ष 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने एक समिति गठित की थी। विचार-विमर्श के बाद कांग्रेस अधिवेशनों में राष्ट्रगीत के पहले दो छंदों के गायन का निर्णय लिया गया। वर्ष 1938 के हरिपुर कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार इन्हीं दो छंदों का गायन किया गया।
इस प्रकार ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जन-जन में राष्ट्रप्रेम, स्वाभिमान और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना जगाने वाला महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। आज इसकी 150वीं जयंती के अवसर पर नई पीढ़ी के लिए इसके ऐतिहासिक योगदान को जानना और समझना विशेष महत्व रखता है।
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