जनजातीय एवं लोक परंपराओं के संरक्षण पर दो दिवसीय परिसंवाद का समापन

खंडवा, 22 अगस्त 2026। माखनलाल चतुर्वेदी शासकीय स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय, खंडवा में कोरकू एवं निमाड़ अंचल की समृद्ध जनजातीय एवं लोक परंपराओं, अनुष्ठानों और सांस्कृतिक स्मृतियों के संरक्षण एवं नई पीढ़ी तक हस्तांतरण को लेकर आयोजित दो दिवसीय परिसंवाद का समापन हुआ।
परिसंवाद में निमाड़ और जनजातीय लोक अनुष्ठानों की परंपराओं, उनके सामाजिक महत्व तथा प्रकृति से संबंध पर शोधपरक चर्चा के साथ विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं।
कार्यक्रम में शैलेन्द्र मालीवाड़ ने बारेला समुदाय के जिरोती एवं नवाई अनुष्ठानों, आयुष सिंघाड़ ने झाबुआ के जातर अनुष्ठान और कमलेश गणावा ने जनजातीय दिवासा अनुष्ठान की जानकारी साझा की। डॉ. अर्चना शुक्ला ने निमाड़ की किशोरियों द्वारा 16 दिनों तक मनाए जाने वाले सांझाकूली अनुष्ठान पर प्रकाश डाला।
सुश्री अनुजा जोशी की टीम ने लोकगीतों के साथ गणगौर नृत्य प्रस्तुत किया। श्रीमती रुकमणी बाई ने भील समुदाय के नाई भराई अनुष्ठान की प्रस्तुति देते हुए बताया कि यह फसल की बुवाई के समय वर्षा और अच्छी फसल की कामना के लिए किया जाता है।
बारेला समुदाय के भीम डावर ने समूह के साथ ढाको वादन के जरिए देव गायना प्रस्तुत किया, जिसे पिथोरा गायन के नाम से भी जाना जाता है। सुखलाल जी बुढ़ाना ने नागमोती अनुष्ठान की प्रस्तुति दी।
अध्यक्षीय उद्बोधन में हेमलता उपाध्याय ने कहा कि विकास के साथ आगे बढ़ना जरूरी है, लेकिन अपनी संस्कृति और प्रकृति से जुड़कर रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक परंपराएं हमारी पहचान और समृद्धि का आधार हैं।
समापन अवसर पर डॉ. विनय जैन ने शोधपरक विचारों और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसे आयोजन जनजातीय एवं लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
लोक कला एवं बोली विकास अकादमी के निदेशक डॉ. पारे ने कहा कि लोक और जनजातीय अनुष्ठानों में चित्रांकन, गायन, धर्म और अध्यात्म की त्रिवेणी देखने को मिलती है, जिसमें रंजन, रस और ज्ञान का प्रवाह होता है। उन्होंने आयोजन की सफलता के लिए महाविद्यालय प्रशासन, विशेषज्ञों, शोधार्थियों, कलाकारों और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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