उग्रवाद और परमाणु जोखिम: क्या पाकिस्तान एशिया में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बन रहा खतरा?

जिनेवा। वैश्विक भू-राजनीति में एशिया की बढ़ती भूमिका के साथ परमाणु सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं भी सामने आ रही हैं। प्रसिद्ध लेबनानी पत्रकार एवं लेखक रेने नाबा के नवीनतम शोध ‘एशिया का परमाणुकरण: परमाणुकरण से एशिया का उदय’ में परमाणु हथियारों, क्षेत्रीय संघर्षों और उग्रवाद के आपसी संबंधों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
यह अध्ययन जुलाई के दूसरे सप्ताह में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सत्र के दौरान जिनेवा में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया। अध्ययन के अनुसार एशिया के परमाणु भविष्य को केवल सैन्य सिद्धांतों और तकनीकी क्षमताओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता। धार्मिक चरमपंथ, भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और अंतरराष्ट्रीय हथियार नियंत्रण व्यवस्था में आ रही कमजोरी भी बड़ी चुनौतियां हैं।
एशिया में बढ़ रही परमाणु प्रतिस्पर्धा
रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन अपने रणनीतिक हथियारों का आधुनिकीकरण कर रहा है, भारत अपनी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत कर रहा है, जबकि पाकिस्तान सामरिक परमाणु क्षमताओं का विस्तार कर रहा है। उत्तर कोरिया के मिसाइल कार्यक्रम तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका और रूस की रणनीतिक गतिविधियां भी सुरक्षा समीकरण को जटिल बना रही हैं।
भारत-पाकिस्तान, चीन-भारत, चीन-ताइवान और उत्तर-दक्षिण कोरिया जैसे तनावपूर्ण समीकरणों के बीच किसी क्षेत्रीय संकट के बड़े रणनीतिक टकराव में बदलने का जोखिम बना हुआ है। शोध में इस बहुध्रुवीय वातावरण को गलत आकलन, आकस्मिक संघर्ष और संकटजन्य अस्थिरता का कारण बताया गया है।
पाकिस्तान और उग्रवाद पर विशेष चिंता
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पाकिस्तान और उग्रवाद से जुड़े परमाणु सुरक्षा जोखिमों पर केंद्रित है। लेखक के मुताबिक खतरा केवल परमाणु प्रतिष्ठानों पर संभावित आतंकी हमलों तक सीमित नहीं है। चरमपंथी विचारधाराएं संस्थागत सुरक्षा उपायों, आंतरिक सुरक्षा और संकट के दौरान निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकती हैं।
रिपोर्ट में पाकिस्तान में दशकों से सक्रिय उग्रवादी नेटवर्क, वैचारिक लामबंदी और क्षेत्रीय परोक्ष संघर्षों से पैदा हुए दीर्घकालिक जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। हालांकि ये निष्कर्ष और आरोप संबंधित शोध/लेखक के आकलन हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के बजाय उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
दक्षिण एशिया को बताया संवेदनशील परमाणु क्षेत्र
शोध में दक्षिण एशिया को दुनिया के अत्यधिक अस्थिर परमाणु संकट वाले क्षेत्रों में से एक बताया गया है। कारगिल से बालाकोट तक हुए सैन्य संकटों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी देशों के बीच पारंपरिक संघर्ष तेजी से गंभीर स्थिति में बदल सकता है। गैर-सरकारी आतंकी संगठनों की मौजूदगी इस अनिश्चितता को और बढ़ाती है।
सिर्फ हथियार नहीं, मजबूत संस्थाएं भी जरूरी
अध्ययन का निष्कर्ष है कि परमाणु सुरक्षा को केवल मिसाइल रक्षा, कमांड एवं कंट्रोल तकनीक और सैन्य सिद्धांतों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। शिक्षा सुधार, जिम्मेदार शासन, अंतरधार्मिक संवाद, आर्थिक अवसर और उग्रवाद से मुकाबले की प्रभावी रणनीति भी दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं।
रिपोर्ट में सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, नागरिक समाज और शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने तथा क्षेत्रीय विश्वास निर्माण और संकट के समय प्रभावी संचार व्यवस्था मजबूत करने की आवश्यकता बताई गई है।
अध्ययन का व्यापक संदेश यह है कि परमाणु युग में स्थायी सुरक्षा केवल सैन्य प्रतिरोध से सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसके लिए जिम्मेदार नेतृत्व, मजबूत संस्थागत व्यवस्था और शांति के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
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