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पाकिस्तान का परमाणु शस्त्रागार और कट्टरपंथ का साया: रेने नाबा की नई किताब ने छेड़ी वैश्विक सुरक्षा पर बहस

जिनेवा। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 62वें सत्र के दौरान जिनेवा में आयोजित एक पैनल चर्चा में अनुभवी पत्रकार एवं भू-राजनीतिक विश्लेषक रेने नाबा की नई पुस्तक “एशिया का परमाणुकरण: परमाणुकरण से एशिया का उदय” चर्चा के केंद्र में रही। पुस्तक में पाकिस्तान के परमाणु शस्त्रागार, देश के भीतर बढ़ते कट्टरपंथ और क्षेत्रीय सुरक्षा पर उसके संभावित प्रभावों को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।

कार्यक्रम न्यारहती परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) समीक्षा सम्मेलन की विफलता, रूस-यूक्रेन युद्ध, ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव और हालिया ईरान-इजराइल-अमेरिका संघर्ष की पृष्ठभूमि में आयोजित किया गया। चर्चा में परमाणु हथियारों और बदलती वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों पर विचार किया गया।

पाकिस्तान के भीतर कट्टरपंथ को बताया बड़ी चुनौती

पुस्तक में रेने नाबा ने तर्क दिया है कि पाकिस्तान की परमाणु क्षमताओं से जुड़ी चिंताओं को केवल उसकी सीमाओं तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उनके अनुसार, पाकिस्तानी समाज में बढ़ता उग्रवाद, सुरक्षा बलों के कुछ वर्गों में वैचारिक घुसपैठ की आशंका और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) जैसे संगठनों की सक्रियता मिलकर एक व्यापक सुरक्षा चुनौती पैदा करती है।

नाबा का विश्लेषण चार प्रमुख जोखिमों की ओर ध्यान आकर्षित करता है—आम नागरिकों में बढ़ता कट्टरपंथ, सशस्त्र बलों के भीतर चरमपंथी विचारधारा के प्रभाव की आशंका, टीटीपी जैसे संगठनों की गतिविधियां और अफगानिस्तान में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद क्षेत्रीय परिस्थितियों में बदलाव। लेखक के मुताबिक, इन परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव परमाणु सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को और गंभीर बना सकता है।

आंतरिक खतरे को लेकर जताई चिंता

पुस्तक में सबसे संवेदनशील मुद्दों में पाकिस्तान के परमाणु प्रतिष्ठानों की आंतरिक सुरक्षा को बताया गया है। नाबा का तर्क है कि किसी परमाणु प्रतिष्ठान के भीतर मौजूद व्यक्ति के कट्टरपंथी विचारधारा से प्रभावित होने की स्थिति बाहरी हमले की तुलना में अलग और गंभीर चुनौती पैदा कर सकती है।

लेखक के अनुसार, परमाणु सुरक्षा को केवल बाहरी हमलों या आतंकवादी गतिविधियों के नजरिए से नहीं, बल्कि संस्थानों के भीतर संभावित वैचारिक प्रभाव और सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है।

अफगान जिहाद के दौर से जोड़ा मौजूदा संकट

रेने नाबा ने मौजूदा परिस्थितियों की ऐतिहासिक जड़ों को 1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 के दशक के अफगान जिहाद से जोड़कर देखा है। पुस्तक के मुताबिक, उस दौर में मदरसों के विस्तार और जिहादी विचारधारा को बढ़ावा मिलने से ऐसे नेटवर्क विकसित हुए, जिनका प्रभाव बाद में अफगान तालिबान और टीटीपी जैसे संगठनों के रूप में सामने आया।

लेखक का मत है कि तत्कालीन भू-राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अपनाई गई नीतियां लंबे समय में गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का कारण बन सकती हैं। पुस्तक इसी ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के जरिए वर्तमान परमाणु सुरक्षा चिंताओं को समझने का प्रयास करती है।

क्षेत्रीय नहीं, वैश्विक मुद्दा है परमाणु सुरक्षा

पुस्तक में पाकिस्तान की परमाणु सुरक्षा को केवल दक्षिण एशिया की समस्या मानने के बजाय व्यापक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था से जोड़कर देखा गया है। इसमें तर्क दिया गया है कि किसी परमाणु शक्ति वाले देश में राजनीतिक अस्थिरता या सुरक्षा तंत्र पर संकट की स्थिति उत्पन्न होने पर उसके प्रभाव क्षेत्रीय सीमाओं से आगे जा सकते हैं।

नाबा के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक दबाव, सैन्य प्रतिक्रिया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसे वैश्विक मंचों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

नागरिक समाज और वैश्विक समुदाय की भूमिका पर जोर

पैनल चर्चा में इस बात पर भी जोर दिया गया कि परमाणु सुरक्षा को केवल किसी एक देश की राष्ट्रीय चिंता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। नागरिक समाज, नीति निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को परमाणु अप्रसार, सुरक्षा तंत्र और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर लगातार संवाद बनाए रखने की आवश्यकता है।

कुल मिलाकर, रेने नाबा की पुस्तक पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम और कट्टरपंथ से जुड़े संभावित खतरों को लेकर एक चेतावनी प्रस्तुत करती है। हालांकि पुस्तक में रखे गए कई निष्कर्ष और आशंकाएं लेखक का विश्लेषण हैं, लेकिन यह बहस जरूर खड़ी करती है कि बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में परमाणु हथियारों की सुरक्षा अब किसी एक देश तक सीमित विषय नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल बन चुकी है।

Anoop Kumar Khurana

Publisher and Editor Anti corruption and crime update & ACACU DIZITEL

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